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435 कैमरों-एक हजार लोगों के बीच की फिल्म की शूटिंग!
First Published:29-06-12 08:45 PM
‘सहर’ जैसी फिल्म बना चुके कबीर कौशिक इस बार ‘मैक्सिमम’ लेकर आए हैं। कई लोगों को लगता है कि ‘मैक्सिमम’ ‘सहर’ का सीक्वल है, जबकि कबीर इससे इंकार करते हैं। हां, यह जरूर मानते हैं कि यह फिल्म असली घटनाओं से प्रेरित है। उनकी बातें उन्हीं के शब्दों में।
पुलिस के खिलाफ पुलिस की कहानी
मेरी फिल्म ‘मैक्सिमम’ निजी जीवन के किसी भी पुलिस अफसर या एनकांउटर स्पेशलिस्ट की कहानी नहीं है। यह पुलिस के खिलाफ पुलिस की कहानी है। सच कहूं तो इस सब्जेक्ट के ग्रे शेड्स ने मुङो इस पर काम करने के लिए प्रेरित किया। एन्काउंटर स्पेशलिस्ट जिस मकसद से नियुक्त किए गए, वह मकसद तो पीछे रह गया। लोगों को याद होगा कि 2003 से 2008 के पांच साल के दौरान कई फेक एन्कांउटर भी हुए। चर्चाएं होती रहीं कि राजनेताओं, पुलिस वालों, बिल्डरों, माफिया डॉन ने इन एंकाउंटर स्पेशलिस्टों से अपने विरोधियों का भी सफाया कराया। इस सब पर मैंने रिसर्च की और यह फिल्म बनाई। यह सच है कि 2003 के आसपास मुंबई शहर को पूरी तरह से माफिया वर्ग ही संचालित कर रहा था। शहर में अपराध बड़ी तेजी से बढ़े थे। उस पर एन्काउंटर स्पेशलिस्टों ने तेजी से अंकुश लगाया था, लेकिन उसके बाद उन्होंने वो सब भी किया, जो हम आम लोगों के लिए, सिस्टम के लिए, समाज के लिए गलत था। इस फिल्म पर काम करने के दौरान मैंने कई साल तक मुंबई पुलिस के एन्काउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा, दया नाइक, विजय सालासकर, प्रफुल भोंसले की कार्यशैली पर नजर बनाए रखी। इनसे मैं मिला भी। मैंने पाया कि मुंबई की पुलिस और दिल्ली या उत्तर प्रदेश की पुलिस में जबरदस्त अंतर है। अरशद की जगह नसीर क्यों?
पहले ‘मैक्सिमम’ में अरशद वारसी थे, पर अचानक इस फिल्म से अरशद की जगह नसीरुद्दीन शाह जुड़ गए। अंतिम वक्त पर अरशद अपनी कुछ दूसरी फिल्मों की वजह से इस फिल्म के साथ नहीं जुड़ पाए। तब मैंने नसीरुद्दीन शाह से बात की और वह तैयार हो गए। उन्होंने इस फिल्म में बहुत बेहतरीन काम किया है। मेरा दावा है कि हर दर्शक नसीरुद्दीन शाह की परफार्मेस की तारीफ जरूर करेगा। सोनू सूद बेस्ट च्वॉइस हैं
जब आप फिल्म देखेंगे तो आपको अहसास होगा कि ग्रे शेड्स वाले पुलिस एन्काउंटर स्पेशलिस्ट प्रताप पंडित के किरदार के लिए सोनू सूद से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था। इस किरदार के लिए जो एटिट्यूड मुझे चाहिए था, वह मुझे सोनू सूद में ही नजर आया। 435 कैमरे और एक हजार लोग
कई बार कई फिल्में एक जैसी लगती हैं। मगर हम कहानी को जिस नजरिए से और जिस तरह से प्रस्तुत करते हैं, उससे बहुत कुछ बदल जाता है। हमने ‘मैक्सिमम’ में दो एन्काउंटर स्पेशलिस्टों की निजी यात्रा को एक पत्रकार के नजरिए से दिखाया है। कहानी को वास्तविक लोकेशन पर फिल्माने से ही पूरी फिल्म का रंग बदल जाता है। हमने मुंबई के गोरेगांव रेलवे स्टेशन पर 435 कैमरों के साथ हजार लोगों की भीड़ के बीच शूटिंग की।
प्रोफाइल
पटना में जन्मे कबीर कौशिक की पढ़ाई दिल्ली के फ्रैंक एंथनी स्कूल व सरदार पटेल विद्यालय में हुई। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के अधीन आने वाले श्री वेंकटेश्वर कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की। लखनऊ यूनिवर्सिटी से एमबीए किया। पहली फिल्म ‘सहर’ का निर्देशन करने से पहले उन्होंने लगभग 400 कॉरपोरेट फिल्में बनाई थीं। ‘सहर’ के बाद कबीर ने ‘चमकू’,‘हम तुम और घोस्ट’ जैसी फिल्में निर्देशित कीं।
मेरी फिल्म ‘मैक्सिमम’ निजी जीवन के किसी भी पुलिस अफसर या एनकांउटर स्पेशलिस्ट की कहानी नहीं है। यह पुलिस के खिलाफ पुलिस की कहानी है। सच कहूं तो इस सब्जेक्ट के ग्रे शेड्स ने मुङो इस पर काम करने के लिए प्रेरित किया। एन्काउंटर स्पेशलिस्ट जिस मकसद से नियुक्त किए गए, वह मकसद तो पीछे रह गया। लोगों को याद होगा कि 2003 से 2008 के पांच साल के दौरान कई फेक एन्कांउटर भी हुए। चर्चाएं होती रहीं कि राजनेताओं, पुलिस वालों, बिल्डरों, माफिया डॉन ने इन एंकाउंटर स्पेशलिस्टों से अपने विरोधियों का भी सफाया कराया। इस सब पर मैंने रिसर्च की और यह फिल्म बनाई। यह सच है कि 2003 के आसपास मुंबई शहर को पूरी तरह से माफिया वर्ग ही संचालित कर रहा था। शहर में अपराध बड़ी तेजी से बढ़े थे। उस पर एन्काउंटर स्पेशलिस्टों ने तेजी से अंकुश लगाया था, लेकिन उसके बाद उन्होंने वो सब भी किया, जो हम आम लोगों के लिए, सिस्टम के लिए, समाज के लिए गलत था। इस फिल्म पर काम करने के दौरान मैंने कई साल तक मुंबई पुलिस के एन्काउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा, दया नाइक, विजय सालासकर, प्रफुल भोंसले की कार्यशैली पर नजर बनाए रखी। इनसे मैं मिला भी। मैंने पाया कि मुंबई की पुलिस और दिल्ली या उत्तर प्रदेश की पुलिस में जबरदस्त अंतर है। अरशद की जगह नसीर क्यों?
पहले ‘मैक्सिमम’ में अरशद वारसी थे, पर अचानक इस फिल्म से अरशद की जगह नसीरुद्दीन शाह जुड़ गए। अंतिम वक्त पर अरशद अपनी कुछ दूसरी फिल्मों की वजह से इस फिल्म के साथ नहीं जुड़ पाए। तब मैंने नसीरुद्दीन शाह से बात की और वह तैयार हो गए। उन्होंने इस फिल्म में बहुत बेहतरीन काम किया है। मेरा दावा है कि हर दर्शक नसीरुद्दीन शाह की परफार्मेस की तारीफ जरूर करेगा। सोनू सूद बेस्ट च्वॉइस हैं
जब आप फिल्म देखेंगे तो आपको अहसास होगा कि ग्रे शेड्स वाले पुलिस एन्काउंटर स्पेशलिस्ट प्रताप पंडित के किरदार के लिए सोनू सूद से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था। इस किरदार के लिए जो एटिट्यूड मुझे चाहिए था, वह मुझे सोनू सूद में ही नजर आया। 435 कैमरे और एक हजार लोग
कई बार कई फिल्में एक जैसी लगती हैं। मगर हम कहानी को जिस नजरिए से और जिस तरह से प्रस्तुत करते हैं, उससे बहुत कुछ बदल जाता है। हमने ‘मैक्सिमम’ में दो एन्काउंटर स्पेशलिस्टों की निजी यात्रा को एक पत्रकार के नजरिए से दिखाया है। कहानी को वास्तविक लोकेशन पर फिल्माने से ही पूरी फिल्म का रंग बदल जाता है। हमने मुंबई के गोरेगांव रेलवे स्टेशन पर 435 कैमरों के साथ हजार लोगों की भीड़ के बीच शूटिंग की।
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पटना में जन्मे कबीर कौशिक की पढ़ाई दिल्ली के फ्रैंक एंथनी स्कूल व सरदार पटेल विद्यालय में हुई। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के अधीन आने वाले श्री वेंकटेश्वर कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की। लखनऊ यूनिवर्सिटी से एमबीए किया। पहली फिल्म ‘सहर’ का निर्देशन करने से पहले उन्होंने लगभग 400 कॉरपोरेट फिल्में बनाई थीं। ‘सहर’ के बाद कबीर ने ‘चमकू’,‘हम तुम और घोस्ट’ जैसी फिल्में निर्देशित कीं।
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