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ओलंपिक का आगाज
First Published:27-07-12 08:35 PM
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जब इससे पहले 1948 में लंदन ने ओलंपिक की मेजबानी की थी, तब अधिकतर यूरोपीय देश दूसरे विश्व युद्ध की तबाही से उबरे नहीं थे। 1944 में ही यह घोषणा हो गई थी कि लंदन अगले ओलंपिक गेम्स की मेजबानी करेगा। इससे साफ होता है कि सब चाहते थे कि युद्धोपरांत ओलंपिक गेम्स लंदन में ही हों। मशहूर वेम्बले स्टेडियम में उद्घाटन समारोह हुआ। 85 हजार दर्शक आए। खेल प्रतियोगियों की परेड में बस 50 मिनट लगे। मुख्य आयोजक लॉर्ड बर्गले ने अपना स्वागत भाषण पढ़ा और कहा,‘समय अब शुरू होता है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘एक दिव्यदर्शी सपना शानदार तरीके से साकार हुआ।’ शुक्रवार देर रात मानो फिर वही समय लौट आया। इस तरह लंदन दुनिया का वह दूसरा महानगर बन गया, जिसने तीन बार ओलंपिक गेम्स की मेजबानी की है।

रिहर्सल में जिन्होंने भी डैनी बॉयल की पेशकश देखी, वे पहले ही समझ गए थे कि यह समारोह सबको जरूर प्रभावित करेगा। वैसे आयोजन से पहले सुरक्षा से जुड़े सवाल उठाए गए। परिवहन समस्या पर भी हो-हल्ला मचा। लेकिन अब इन खामियों को दरकिनार करना आसान है, क्योंकि हम मानते हैं कि ये सब खेल आयोजन के हिस्से हैं और इनसे कोई भी देश खुद को बचा नहीं सकता। असली परीक्षा तो दुनिया भर के शीर्ष एथलीटों के बीच होगी। बदकिस्मती से इस महामुकाबले को यदा-कदा किन्हीं गलत वजहों से हाइजैक कर लिया जाता है। मसलन, 40 साल पहले म्यूनिख में 11 इजरायली एथलीटों की हत्या कर दी गई थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि ओलंपिक गेम्स का जरूरत से ज्यादा प्रचार हो रहा है। यह मानने में भी कोई गुरेज नहीं कि इस खेल का कारोबारीकरण हो गया है। आधुनिक ओलंपिक के संस्थापकों ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। 1948 में इस खेल पर कुल दस लाख पाउंड खर्च हुए थे। बीबीसी ने 60 घंटे का प्रसारण अधिकार महज एक हजार पाउंड में खरीदा था। तब की आधिकारिक रिपोर्ट कहती है, ‘यह खेल एक महान युगांतकारी घटना है, न केवल खेल के मायने में, बल्कि युवाओं की उपलब्धि के मायने में भी।’ क्या 2012 ओलंपिक के बारे में भी ऐसा कहा जाएगा?       
टेलीग्राफ, ब्रिटेन

 
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