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राहुल का इम्तिहान
First Published:19-07-12 08:01 PM
राहुल गांधी ने बहुत स्पष्ट शब्दों में नहीं कहा है, लेकिन उनके कहने का यही अर्थ निकाला जा रहा है कि वह पार्टी में और सरकार में भी जल्दी ही कोई ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे। पिछले दिनों सलमान खुर्शीद और दिग्विजय सिंह के बयानों से यह साफ हो गया है कि कांग्रेसजन यह जानते हैं कि राहुल गांधी ही कांग्रेस के भावी नेता हैं और अब वह पृष्ठभूमि से निकलकर सबसे आगे नेतृत्व करते हुए दिखें। राहुल गांधी ने जब राजनीति में शुरुआत की थी, तो सबने उनकी मौजूदा शैली को सराहा था। बजाय सीधे कोई बड़ा पद लेकर शुरुआत करने की, उन्होंने जमीनी स्तर पर देश और पार्टी की हकीकत समझने की कोशिश की थी।
यह बात लोगों को अच्छी लगी कि कोई बड़ी जिम्मेदारी उठाने से पहले वह जरूरी तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस, खासतौर पर युवा कांग्रेस के ढांचे को बदलने और उसे ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की भी उन्होंने कोशिश की। पिछले लोकसभा चुनावों में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन, खासतौर पर उत्तर प्रदेश में अनपेक्षित सफलता में इस रणनीति की सफलता भी देखी गई। संप्रग की दूसरी पारी शुरू तो उत्साह से हुई, लेकिन उसके बाद सरकार और पार्टी लगातार मुश्किलों में घिरती चली गई। इन मुश्किलों की राजनीतिक व्याख्या की जा सकती है और कुछ लोगों को इसका दोषी ठहराया जा सकता है, लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं और उन्हें भांपने में पार्टी का नेतृत्व चूक गया। संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, दोनों की कार्यशैली बहुत मुखर और नाटकीय नहीं है। दोनों ही चुपचाप, बिना ज्यादा हो-हल्ले के कामकाज करने में यकीन रखते हैं। जब परिस्थितियां मुश्किल हों, तो कार्यकर्ता चाहते हैं कि ज्यादा मुखर और गतिशील नेतृत्व हो, जो कार्यकर्ताओं की फौज के आगे चलते हुए उन्हें जोश दिला सके। इस वजह से कार्यकर्ता यह चाहते हैं कि राहुल गांधी ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी संभालें। देश के लोग भी यह चाहेंगे कि अगर कांग्रेस और संप्रग के भावी नेता राहुल गांधी ही हैं, तो वह अपनी काबिलियत को साबित करें, ताकि 2014 के चुनावों के पहले तस्वीर साफ हो जाए। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य ऐसा है कि कांग्रेस और संप्रग मुसीबतों में घिरे हुए हैं, लेकिन विपक्ष की मुसीबतें ज्यादा बड़ी हैं। इस बीच भाजपा ने अपने प्रभाव का विस्तार नहीं किया है, बल्कि उसकी स्वीकार्यता उस दौर के मुकाबले घटी है, जब अटल बिहारी वाजपेयी सक्रिय थे और लालकृष्ण आडवाणी निर्विवाद नेता थे। अगर राहुल गांधी 2014 के पहले मतदाताओं में अपनी स्वीकार्यता बढ़ा लेते हैं, तो संप्रग को बढ़त मिल सकती है।
अब तक ऐसा लगता रहा है कि राहुल गांधी पूरी तरह राजनीति में आने में झिझक रहे हैं, वे रुक-रुककर और बहुत सोच-समझकर अपना कार्यक्रम चुनते हैं। संभव है कि यह उनकी भलमनसाहत हो, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में कीचड़ में पांव गंदे करना जरूरी है। भारत की राजनीति लगातार ज्यादा प्रतिस्पर्धी होती जा रही है और मतदाता अपने प्रतिनिधियों का ज्यादा कड़ा इम्तिहान लेने लगे हैं। इस विशाल लोकतांत्रिक देश की बागडोर संभालने की इच्छा जिसकी भी हो, उसे पहले इस इम्तिहान से गुजरना पड़ेगा। नए भारत की जनता तेजी से विकास चाहती है और 24 घंटे के टीवी के जमाने में उसकी नजर लगातार अपने नेता पर रहती है। किसी एक व्यक्ति के लिए इतिहास और समय रुकता नहीं है, लेकिन व्यक्ति ही इतिहास के बड़े अध्याय रचते हैं। अगर राहुल गांधी भारत का भविष्य हैं, तो जरूरी है कि वह हिचकिचाहट छोड़कर स्पष्ट शब्दों में अपने इरादे की सार्वजनिक घोषणा करें।
अब तक ऐसा लगता रहा है कि राहुल गांधी पूरी तरह राजनीति में आने में झिझक रहे हैं, वे रुक-रुककर और बहुत सोच-समझकर अपना कार्यक्रम चुनते हैं। संभव है कि यह उनकी भलमनसाहत हो, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में कीचड़ में पांव गंदे करना जरूरी है। भारत की राजनीति लगातार ज्यादा प्रतिस्पर्धी होती जा रही है और मतदाता अपने प्रतिनिधियों का ज्यादा कड़ा इम्तिहान लेने लगे हैं। इस विशाल लोकतांत्रिक देश की बागडोर संभालने की इच्छा जिसकी भी हो, उसे पहले इस इम्तिहान से गुजरना पड़ेगा। नए भारत की जनता तेजी से विकास चाहती है और 24 घंटे के टीवी के जमाने में उसकी नजर लगातार अपने नेता पर रहती है। किसी एक व्यक्ति के लिए इतिहास और समय रुकता नहीं है, लेकिन व्यक्ति ही इतिहास के बड़े अध्याय रचते हैं। अगर राहुल गांधी भारत का भविष्य हैं, तो जरूरी है कि वह हिचकिचाहट छोड़कर स्पष्ट शब्दों में अपने इरादे की सार्वजनिक घोषणा करें।
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