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उम्मीद का रास्ता
First Published:06-07-12 10:50 PM
अर्थव्यवस्था उम्मीद पर चलती है, क्योंकि भविष्य में निवेश उम्मीद के भरोसे ही किया जाता है। उम्मीद जिस हद तक वास्तविक परिस्थितियों के आकलन पर निर्भर करती है, उतनी ही कुछ धारणाओं और विश्वासों पर भी।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक उद्योगपति का कथन अपने ताजा इंटरव्यू में उद्धृत किया है कि भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में ‘बाजार में मूड जितना खराब है, उतनी खराब स्थिति जमीन पर नहीं है।’ यह कथन यथार्थ और धारणा के बीच के जटिल संबंध को दिखाता है। लेकिन इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री के लिए एक बात फायदेमंद है कि उनके वित्त मंत्रालय संभालने के साथ ही उम्मीद का माहौल बन गया है। लोग यह सोचना चाहते थे और उनके सोचने के लिए आधार मिल गया है कि भारत की धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था को वापस टॉप गियर में लाने के लिए कुछ कदम उठाए जाएंगे। इसकी एक वजह तो बतौर वित्त मंत्री उनका पिछला रिकॉर्ड है।
जब वह नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री बने थे, तभी आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई थी, इसलिए लोग यह उम्मीद लगा रहे हैं कि उनकी दूसरी पारी में भी अर्थव्यवस्था को नई तेजी मिलेगी। प्रधानमंत्री के शुरुआती बयानों और इस इंटरव्यू से भी इस धारणा को मजबूती मिली है।
अगर उम्मीद के इस माहौल को वह कुछ ठोस फैसलों का वजन भी दे पाए, तो अर्थव्यवस्था काफी बेहतर हो सकती है। बहरहाल, एक बात कही जा सकती है कि अर्थव्यवस्था में जो बुरा हो सकता था, वह हो गया है। भ्रष्टाचार के इतने बड़े मामले उजागर हो चुके हैं और उनसे ऐसा भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बन गया है कि अगले दो वर्षो में ए राजा या सुरेश कलमाडी जैसे लोग खुली लूट की छूट नहीं पा सकेंगे।
आर्थिक सुधारों के ज्यादातर विरोधी भी यह समझ चुके हैं कि यदि अर्थव्यवस्था को अब भटकने दिया गया, तो भविष्य में स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो सकती है। ऐसे में, प्रधानमंत्री वे कदम उठा सकते हैं, जिनसे बाजार में उत्साह का माहौल बने।
प्रधानमंत्री ने जिन क्षेत्रों की ओर संकेत किया है, उनमें बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर नए कदमों की घोषणा मुमकिन है।
बुनियादी ढांचे के कई क्षेत्रों में जो मुश्किलें हैं, उनमें से ज्यादातर को दूर करना किसी बड़े नीतिगत फैसले पर निर्भर नहीं है।कुछ प्रशासनिक अड़चनों को दूर करने मात्र से कई परियोजनाएं अमल में लाई जा सकती हैं। एक बड़ी समस्या रेलवे है, जिसमें भारी बदलाव की गुंजाइश है, लेकिन सड़क, बिजली, बंदरगाह इत्यादि में छोटे व मध्यम स्तर पर निहित स्वार्थो से निपटकर बड़े पैमाने पर गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं।
इसी तरह निवेश के रास्ते में लालफीताशाही की झंझटों को कम करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर सुधारों से चीजें रास्ते पर आ सकती हैं। अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े फैसलों की जरूरत है, लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी एक या दो बड़े नाटकीय फैसलों से अचानक अर्थव्यवस्था में बदलाव आ जाएगा। ऐसे फैसलों पर राजनीतिक टकराव से बचते हुए छोटे-छोटे स्तरों पर नट-बोल्ट कसना भी उतना ही जरूरी है और उससे अर्थव्यवस्था की बेहतरी हो सकती है। यह तरीका प्रधानमंत्री के स्वभाव के अनुकूल भी है और वित्त मंत्रलय उनके पास आने के बाद इसके संकेत भी मिलने लगे हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था की चुनौतियों और अपनी योजनाओं को लेकर ज्यादा मुखर हुए हैं। लोकतंत्र में जनता के साथ संवाद का अपना महत्व है और इससे विश्वास का माहौल बनता है। प्रधानमंत्री की शुरुआत तो अच्छी हुई है, लेकिन आगे वक्त कम है, इसलिए जरूरी है कि इस बुनियाद पर अर्थव्यवस्था के उद्धार की योजना को तुरंत अमल में लाया जाए।
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