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सूक्ष्म कणों का असली देवता
अमित चौधरी, प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया
First Published:04-07-12 10:12 PM
Last Updated:04-07-12 10:23 PM
इस समय पूरी दुनिया में हर किसी की जुबान पर हिग्स बोसोन का नाम है। इस तरह की प्रसिद्धि अक्सर किसी भी खोज को नहीं मिलती। यहां तक कि अब तक की कई बहुत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों पर भी इतनी चर्चा नहीं हुई। चेचक की वैक्सीन, डीएनए की संरचना या सापेक्षता का सिद्धांत, जिस समय ये सारी चीजें सामने आईं, ये लोकप्रियता से कोसों दूर थीं। लेकिन, सही या गलत, हिग्स बोसोन को भगवान से जोड़कर गॉड पार्टिकल कहा जाने लगा और इसी में इसकी लोकप्रियता का राज भी छिपा है।
हालांकि ज्यादातर लोगों के लिए इस सूक्ष्म कण का महत्व समझ पाना मुश्किल है, वैसे ही जैसे उनके लिए सापेक्षता के सिद्धांत को समझ पाना कठिन है। लेकिन ऐसी समस्याओं का समाधान अक्सर हम विज्ञान को कुछ व्यक्तित्वों से जोड़कर या सांस्कृतिक व राष्ट्रीय परंपराओं का हिस्सा बनाकर निकाल लेते हैं। हिग्स बोसोन के बारे में हम सबसे पहली चीज यह जानते हैं कि इसका नाम वैज्ञानिक पीटर हिग्स के नाम पर रखा गया है। एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के इस प्रोफेसर ने ही इसकी अवधारणा तैयार की थी। हालांकि इस काम में फिलिप्स एंडरसन के योगदान की भी कहानियां अक्सर सुनाई जाती हैं। लेकिन हम हिग्स, एडिनबर्ग और पश्चिमी सभ्यता सभी को एक साथ जोड़कर देखते हैं। अभी तक की परिभाषा के हिसाब से देखें, तो ‘हिग्स बोसोन एक काल्पनिक मूल कण है, जिसकी संभावना पार्टिकल फिजिक्स के स्टैंडर्ड मॉडल के आधार पर व्यक्त की गई है। यह सूक्ष्म कणों की उस श्रेणी में आता है, जिसे बोसोन कहा जाता है।’ खैर हमें परिभाषा की ज्यादा चिंता वैसे भी नहीं है। फिर भी यह विचार तो मन में आता ही है कि इसमें आखिर यह ‘बोसोन’ क्या है? यह शब्द हमारा ध्यान इसलिए भी खींचता है, क्योंकि यह हिग्स के तुरंत बाद आता है। मेरे जैसा अज्ञानी आदमी तो सबसे पहले यही पूछेगा कि यह किसी परमाणु जैसा होता है या फिर किसी अणु जैसा? दरअसल, यह परमाणु से भी छोटे दो तरह के कणों में एक प्रकार है। दूसरी तरह के ऐसे कणों को फर्मिऑन कहते हैं, जिनका नाम वैज्ञानिक एनरिको फर्मी के नाम पर रखा गया है।
बोसोन शब्द सुनने में कुछ-कुछ यूरोपीय या जर्मन वंशावली का लगता है। लेकिन हकीकत में बोसोन शब्द भारतीय भौतिक वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस के नाम से निकला है। कोलकाता के इस वैज्ञानिक को 1924 में यह अहसास हुआ कि गैसों के तापीय व्यवहार के विश्लेषण के लिए 19वीं सदी में जो सांख्यिकीय तरीके तय किए गए, वे अपर्याप्त हैं। उन्होंने क्वांटम स्टेटिस्टिक्स पर ढाका में शोधपत्र लिखा और एक ब्रिटिश जर्नल को भेज दिया, लेकिन उस ब्रिटिश जर्नल ने इसे छापने से इनकार कर दिया। उसके बाद बोस ने उस शोधपत्र को सीधे अल्बर्ट आइंस्टीन को भेज दिया। आइंस्टीन ने इसके महत्व को समझा और तुरंत ही इसका अनुवाद करके इसे एक जर्मन जर्नल में छपवा दिया। यहां हम कह सकते हैं कि इस नाम का जर्मन भाषा से कुछ तो जुड़ाव है ही। बोस की इस खोज को बोस- आइंस्टीन स्टेटिस्टिक्स के नाम से जाना जाता है और यह अब क्वांटम मैकेनिक्स का मूल आधार है। आइंस्टीन समझ गए थे कि इसका भौतिक विज्ञान पर बहुत महत्वपूर्ण असर पड़ेगा। इसी से परमाणु से छोटे कणों को खेजने का रास्ता खुला, जिनका नाम आइंस्टीन ने ही ‘बोसोन’ रख दिया। शायद ही कोई भौतिक विज्ञानी इस बात से असहमत हो कि बोस-आइंस्टीन स्टेटिस्टिक्स का भौतिक विज्ञान पर जितना असर हुआ, उतना तो शायद आने वाले समय में हिग्स बोसोन का भी न हो।
सच तो यही है कि हम अब भी विज्ञान को पश्चिम का पर्याय ही मानते हैं। ये दो अलग तरह के शब्द हैं, लेकिन इनके अर्थ बहुत दूर तक साथ-साथ जाते हैं। भारत की आखिरी वैज्ञानिक खोज, जिसे पूरी दुनिया में मान्यता मिली, वह खोज थी शून्य। करोल वॉर्डरमैन का कहना है कि भारतीय एक चीज में काफी अच्छे होते हैं और वह है गणित। अकेला आधुनिक भारतीय, जो पश्चिम के इस मिथक पर खरा उतरते हैं, वह हैं श्रीनिवास रामानुजम। वह गणित की अपनी विलक्षण प्रतिभा के लिए जितने प्रसिद्ध थे, उतने ही कैंब्रिज प्रवास के दौरान हिंदू कर्मकांडों के पालन के लिए भी जाने जाते थे।
भारतीय बहुत अच्छे फितरती भी हो सकते हैं, जैसा कि अमेरिकी टीवी सीरियल बिग बैंग थ्योरी में अक्सर चुप-से रहने वाले राज कूथरपल्ली का चरित्र दिखाया गया है। लेकिन इस सीरियल में नोबेल पुरस्कार उससे कहीं ज्यादा फितरती शेल्डॉन कूपर को मिलता है, जो यह मानता है कि राज जिस देश से आया है, वह उसकी सबसे बड़ी बाधा है। यानी बिग बैंग थ्योरी भी विज्ञान के इसी मिथक के आधार पर चलती है। बोस को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। न ही उनके समकालीन जगदीश चंद्र बोस को मिला। जगदीश चंद्र बोस ने रेडियो तरंगों पर मारकोनी से बहुत पहले काम कर लिया था। अकेले भारतीय भौतिक शास्त्री, जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, वह थे सी वी रमन। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय में जो काम किया, उसे रमन इफेक्ट्स कहा जाता है। बाकी भारतीयों को यह पुरस्कार पाने के लिए अमेरिकी होना पड़ा।
औपनिवेशिक काल से आज तक भारत में विज्ञान पर शोध के हालात बहुत अच्छे नहीं रहे। लेकिन इसके बावजूद भारत के वैज्ञानिकों का योगदान अक्सर बहुत बड़ा रहा है। लेकिन गैर-पश्चिमी विज्ञान (यह बहुत भद्दा जुमला है, जिसे पश्चिम की लोकप्रिय सोच ने ही तैयार किया है) को अभी अपना रोजलिंड फ्रेंकलिन नहीं मिला। यानी ऐसा प्रतीक नहीं मिला, जो इसकी कामयाबी की कहानी कह सके। लेकिन फ्रेंकलिन के विपरीत उन्होंने जो रेस हारी, उसमें वे कभी थे ही नहीं। जैसे वे किसी दूसरे ही ग्रह से आए हों।
साभार - गार्जियन
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
साभार - गार्जियन
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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