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कूल कैप्टन धौनी
First Published:15-06-12 10:54 PM
मैदान पर भारतीय टीम को जूझना किसने सिखाया? जवाब है, सौरव गांगुली ने। और फिर जीतना? यकीनन इसका जवाब होगा, महेंद्र सिंह धौनी। ऐसे में, न जाने क्यों यह बहस छिड़ गई है कि भारतीय टेस्ट टीम का कप्तान किसे बनाया जाए? मीडिया में यह खबर है कि बोर्ड अब धौनी की जगह गंभीर को टेस्ट की कप्तानी सौंपना चाहता है। एक कप्तान के तौर पर धौनी खासा सफल रहे हैं। उनकी अगुवाई में टीम टी-20 और वनडे, दोनों की विश्व चैंपियन बनी। जब 2008 में अनिल कुंबले ने टेस्ट टीम की कप्तानी छोड़ी, तो धौनी की अगुआई में ही हमारे लड़ाकों ने टीम ऑस्ट्रेलिया को भारत में हराया था। ऐसे में, युवा बल्लेबाज विराट कोहली ने ठीक ही कहा है कि धौनी एक बेहतरीन कप्तान हैं और उन्हें बदलने की कोई जरूरत नहीं है। मेरा भी मानना है कि धौनी कूल कैप्टन हैं और उनसे एक बल्लेबाज, विकेटकीपर और कप्तान के तौर पर टीम इंडिया के प्रशंसकों को अभी काफी सारी उम्मीदें हैं।
वीरेन सिंह, जयपुर, राजस्थान
कौन बनेगा राष्ट्रपति
कभी राष्ट्रपति पद के लिए आम सहमति बनती थी। अब राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के लिए धींगामुश्ती होती है। विडंबना यह है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में ही मतैक्य नहीं दिखा। किसी को च्वॉइस नंबर एक बताया जा रहा था, तो किसी को नंबर दो। यह सिलसिला नंबर पांच तक पहुंच गया। ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रपति की कुरसी प्रतिष्ठा, मर्यादा व योग्यता से ज्यादा व्यक्तिगत पसंद व नापसंद की बनकर रह गई है। इस पद के लिए इतनी राजनीतिक खींचतान का गवाह तो हमारा संसदीय लोकतंत्र कभी नहीं रहा। कांग्रेस को भरोसा है कि वह प्रणब मुखर्जी के नाम पर सभी सहयोगी दलों को एकजुट कर लेगी। परंतु एक बार तो उसका खेल ही बिगड़ गया था। उसके खेमे की दो महत्वपूर्ण सियासी पार्टियों ने तीन नाम- पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी सुझा दिए थे। हो गई न विचित्र बात? अभी तो प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा व उसके गठबंधन ने अपना पासा फेंका ही नहीं था। बहरहाल, इस पद के लिए ऐसी सौदेबाजी उचित नहीं कही जा सकती।
संजीत कुमार, चिराग दिल्ली, नई दिल्ली शतरंज के बाजीगर
वह देश, जहां खेल को जीवन से बढ़कर माना जाता है, वहां विश्वनाथन आनंद की जीत पर हर्षोल्लास का माहौल न हो, यह अच्छी बात नहीं है। जब हम पूरे दिन टीवी सेट से चिपककर सचिन के शतक की दुआ कर सकते हैं, तो हमारा फर्ज बनता है कि विश्वनाथन आंदन की जीत का भी जश्न मनाएं। लेकिन न तो अब तक राज्य सरकारों की ओर से पुरस्कार राशि की घोषणा हुई है और न ही कोई आयोजन। शतरंज के बाजीगर के विश्व चैंपियन बनने पर यह बेकदरी क्यों?
प्रशांत शर्मा, कटवरिया सराय, दिल्ली नतीजे के बाद
सीबीएसई की 12वीं कक्षा के नतीजे आ गए हैं। खुशी और गम का माहौल, दोनों है। परंतु इसमें दोराय नहीं कि जो नाकामयाब हुए हैं, उनके भविष्य के दरवाजे अब भी खुले हुए हैं। बस जरूरत यह है कि अगली बार के लिए तैयारियां की जाएं। अक्सर हमारे बच्चों की शिकायत होती है कि तैयारी तो पूरी थी, लेकिन नतीजे ठीक नहीं आए। इसके बाद कमजोर दिल के कुछ बच्चों हताशा के चरम क्षणों में कुछ भी गलत कदम उठा लेते हैं। लेकिन नतीजे तो नतीजे होते हैं, जिंदगी उनसे कहीं बड़ी चीज होती है। इसलिए दूसरे अवसरों को टटोलिए और बेहतर बनने की ओर कदम बढ़ाइए।
अरुण कुमार, आजादपुर, दिल्ली
वीरेन सिंह, जयपुर, राजस्थान
कभी राष्ट्रपति पद के लिए आम सहमति बनती थी। अब राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के लिए धींगामुश्ती होती है। विडंबना यह है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में ही मतैक्य नहीं दिखा। किसी को च्वॉइस नंबर एक बताया जा रहा था, तो किसी को नंबर दो। यह सिलसिला नंबर पांच तक पहुंच गया। ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रपति की कुरसी प्रतिष्ठा, मर्यादा व योग्यता से ज्यादा व्यक्तिगत पसंद व नापसंद की बनकर रह गई है। इस पद के लिए इतनी राजनीतिक खींचतान का गवाह तो हमारा संसदीय लोकतंत्र कभी नहीं रहा। कांग्रेस को भरोसा है कि वह प्रणब मुखर्जी के नाम पर सभी सहयोगी दलों को एकजुट कर लेगी। परंतु एक बार तो उसका खेल ही बिगड़ गया था। उसके खेमे की दो महत्वपूर्ण सियासी पार्टियों ने तीन नाम- पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी सुझा दिए थे। हो गई न विचित्र बात? अभी तो प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा व उसके गठबंधन ने अपना पासा फेंका ही नहीं था। बहरहाल, इस पद के लिए ऐसी सौदेबाजी उचित नहीं कही जा सकती।
संजीत कुमार, चिराग दिल्ली, नई दिल्ली शतरंज के बाजीगर
वह देश, जहां खेल को जीवन से बढ़कर माना जाता है, वहां विश्वनाथन आनंद की जीत पर हर्षोल्लास का माहौल न हो, यह अच्छी बात नहीं है। जब हम पूरे दिन टीवी सेट से चिपककर सचिन के शतक की दुआ कर सकते हैं, तो हमारा फर्ज बनता है कि विश्वनाथन आंदन की जीत का भी जश्न मनाएं। लेकिन न तो अब तक राज्य सरकारों की ओर से पुरस्कार राशि की घोषणा हुई है और न ही कोई आयोजन। शतरंज के बाजीगर के विश्व चैंपियन बनने पर यह बेकदरी क्यों?
प्रशांत शर्मा, कटवरिया सराय, दिल्ली नतीजे के बाद
सीबीएसई की 12वीं कक्षा के नतीजे आ गए हैं। खुशी और गम का माहौल, दोनों है। परंतु इसमें दोराय नहीं कि जो नाकामयाब हुए हैं, उनके भविष्य के दरवाजे अब भी खुले हुए हैं। बस जरूरत यह है कि अगली बार के लिए तैयारियां की जाएं। अक्सर हमारे बच्चों की शिकायत होती है कि तैयारी तो पूरी थी, लेकिन नतीजे ठीक नहीं आए। इसके बाद कमजोर दिल के कुछ बच्चों हताशा के चरम क्षणों में कुछ भी गलत कदम उठा लेते हैं। लेकिन नतीजे तो नतीजे होते हैं, जिंदगी उनसे कहीं बड़ी चीज होती है। इसलिए दूसरे अवसरों को टटोलिए और बेहतर बनने की ओर कदम बढ़ाइए।
अरुण कुमार, आजादपुर, दिल्ली
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