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अनुकंपा पर नियुक्ति का दावा अधिकार नहीं: न्यायालय
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:28-05-12 07:34 PM
उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सरकारी कार्यालयों में अनुकंपा के आधार पर नियुक्तियों के लिए दावा अधिकार के तौर पर नहीं किया जा सकता और नियम के अनुसार सिर्फ उचित मामलों में ही उसकी अनुमति है, अन्यथा इससे संविधान का उल्लंघन होगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए अधिकार के तौर पर दावा नहीं किया जा सकता। नियम के अनुसार, लोक सेवा नियुक्तियां सिर्फ खुला आवेदन आमंत्रित करके और मेधा के आधार पर होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति भर्ती का अन्य स्रोत नहीं है, बल्कि यह उपरोक्त जरूरत का अपवाद है जिसके तहत परिवार के लिए आजीविका का कोई साधन छोड़े बिना सेवा में रहते हुए कर्मचारी की मौत हो जाने के तथ्य को ध्यान में लिया जाता है।
न्यायमूर्ति बीएस चौहान और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ ने यह व्यवस्था इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील को मंजूर करते हुए दी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शशांक गोस्वामी की अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह स्थापित कानूनी प्रस्ताव है कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए दावा इस तर्क के आधार पर किया जाता है कि आवेदक मत कर्मचारी पर आश्रित था।
पीठ ने कहा कि इस तरह के दावे को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 या 16 की कसौटी पर बरकरार नहीं रखा जा सकता। पीठ ने कहा कि हालांकि, इस तरह के दावे को ऐसे कर्मचारी के परिवार में अचानक पैदा हुए संकट के आधार पर तर्कसंगत और स्वीकृति योग्य माना गया है जिसने देश की सेवा की और सेवा के दौरान उसकी मौत हो गई।
पीठ की ओर से न्यायमूर्ति चौहान ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में उद्देश्य अचानक पैदा हुए वित्तीय संकट से उबरने के लिए परिवार को सक्षम बनाना है और परिवार को दर्जा प्रदान करना इसका उद्देश्य नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का प्रावधान करता है जबकि अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता का प्रावधान करता है।
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